थोड़े दिन पहले भारतीय सेना ने नक्सलवादियो को म्यांमार की सिमा में अंदर घुस के मारा।
ये समाचार थोड़े ही घंटो में पुरे देश में पहोच गए। पूरा देश मानो ख़ुशी से झूम उठा। सेना के
जवानो के सर गर्व से ऊचे हो होंगे।
पहेली बार देश ने सर्जिकल स्ट्राइक के बारे में जाना। पहेली बार दुश्मनो को चूहे की तरह मरते हुए
देखा, वरना अब तक तो सिर्फ जवानो के शहीद होने की खबरे ही आती थी।
चीन को समज में आ गया होगा की अब ये पहले वाला भारत नहीं रहा। यहाँ ईट जवाब बन्दुक से मिलेगा। जो नकस्ली मारे गए है उन को ट्रेनिंग और हथियार चीन ही देता था।
आज भी भारत के लोगो को वो दिन अच्छी तरह याद है जब कसाब और उनके साथी हमारे नागरिको को बेरहमी से सरेआम मार रहा था। हमारे ही घर में आकर हमारे ही नागरिको को मारने की जुर्रत की थी उन लोगो ने। पर हमारे नेता ऐसे बयान दे रहे थे जेसे सारे आतंकी उनके बयान से ही मर जाने वाले हो। पुरे विश्व् में शांति का ठेका मानो हमने ही ले रखा था।
अभी तो ये सिर्फ सुरुआत है। हमें तब तक शांति से नहीं बेठना चाहिए जब तक हिंदुस्तान के दुश्मनो के दिल में हमारा ख़ौफ़ न हो। चाहे पाकिस्तान में हो या अरब देश में उनको मोत सर पे मंडराती दिखनी चाहिए। ये सब कैसे होगा? हमें इसारयल से सीखना होगा।
एक आतंकी इसरायल के दुश्मन देश में जाके छुप के बेठा था। मोसाद जोकि इसरायल की जासूसी संस्था है उसे पता चला। तुरंत एक प्लान बनाके जासूस को रवाना किया। दुश्मन को दुश्मन के देश में जाके मारना था। ये कोई आसान बात नहीं थी। पर उसका पाला भी मोसाद से पड़ा था लिहाजा उस आतंकी की मोत तो निश्चित ही थी।
सुबह का समय होगा शायद। आतंकी के घर का पता लगाने के बात उनके टेलेफोन की वायर काट दी। बाद में टेलीफोन रिपेर कहाने के बहाने वो जासूस घर में घुसा। थोड़ी देर बाद टेलीफोन रिपेर करके वो चला गया। कुछ मिनिट का समय बिता होगा। टेलेफोन की घंटी बजती है। आतंकी जेसे ही फोन उठता है, धड़ाम की आवाज से पूरा इलाका गूंज उठता है और वो आतंकी वही ढेर हो जाता है।
उस टेलेफोन के साथ उस जासूस ने बम लगा के रखा था। ऐसे ही एक एक करके इसरायल अपने दुश्मनो को साफ करता है और उनके दिलो में ख़ौफ़ बिठा देता है। ताकि इसरायल से पंगा लेने से पहले कोई भी आतंकी हजार बार सोचे।
हमारे यहाँ क्या ऐसा करना संभव है? इसका जवाब आपको देना होगा क्योकि हमारे यहाँ आतंकी जैसे शेतानो को भी इंसान मानाने वालो की एक पूरी जमात है। जो उन पुलिस वालो के बारे में भी नहीं सोचते जो जवान एनकाउंटर में शहीद होते है। उसका सही उदाहरण बाटला हाउस एनकाउंटर है।
पर शायद अब हवा ने रुख बदला है। देखते है आगे क्या होता है।
जय हिन्द। वंदे मातरम्।
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